अपने राजगीर प्रवास के दौरान अक्सर पान संस्थान केंद्र पर जाने का दिल होता था। एक तो यह पटना से राजगीर (वाया हिलसा एकंगरसराय ) के रास्ते में पड़ता था जहां मेरा आना जाना पिछले दो माह से सरकारी कार्य वश लगा हुआ है, दूसरे, इसके नजदीक के प्रखंड परवलपुर में मैं कभी प्रखंड विकास पदाधिकारी / बीडीओ के रूप में पदस्थापित होने से इस क्षेत्र से वाकिफ था और तब कभी कभार पान भी खाया करता था जो आगे चलकर मिथिला प्रवास (बासोपट्टी प्रखंड मधुबनी 2003 से 2005 तक) के दिनों में आदत के रूप में तब्दील होती चली गई जो लत बाद में पटना आकर ही छूटी। मिथिला की पहचान है पान, माछ (मछली) और मखान। बासोपट्टी चौक पर छोटूवा का पान दुकान था जहां का पान सबसे बढ़िया क्वालिटी का होता था। एक बार 2005 के चुनाव के दरम्यान इलेक्शन के सुपर अधिकारी हरफनमौला श्रीमान के जे राव इसी चौक पर आकर छोटुवा से ही बीडीओ का फीडबैक लेने लगे। उस दिन छोटुआ ने मेरे बारे में जो बताया की उसके बाद मेरी ड्यूटी बासोपट्टी के अलावे अन्य प्रखंडों में भी बॉरो बीडीओ के तौर पर चुनाव में लगने लगी। राव साहेब ने मीटिंग में बताया की कॉमन आदमी से बेहतर कोई फीडबैक नहीं दे सकता। बात सही थी मगर जरूरी नहीं होता की हर व्यक्ति का फीडबैक ऐसा ही होता। मगर उस दिन पान ने जान बचा दी और मैं अपने पान खाने की आदत पर धन्यवाद देने लगा और छोटूवा के पास एक टाइम का पान और बढ़ा दिया। बासोपट्टी छोड़ने के वक्त अंतिम बिदाई छोटू से ही ली थी। इसके पत्तों को देखकर मन उल्लसित हो उठता था। उसमे लगते हुए कत्थे - चूने और ऊपर से सौंफ आदि को संजोना फिर उसे त्रिकोणात्मक शैली में चपोत्तना आदि देखना मन को आनंद से भर देता था और हल्के से जब मुंह में रखा जाता तो पूरा वातावरण सुगंधित हो उठता। माउथ फ्रेशनर के तौर पर इसने जो पहचान हासिल की है वो शायद ही किसी और पौधे को प्राप्त है। बहरहाल तब पान के औषधीय गुणों से वाकिफ नहीं था। हां पूजा पाठ का कोई भी कार्यक्रम पान और आम के पत्ते और एक नारियल के बिना आज भी पूरा नहीं हो सकता। ये हमारे पूर्वजों की प्रकृति प्रेम की ओर इशारा करती है जो प्रेम पूजा सामग्री बन कर परंपरा में शामिल हो गई। सो आज पान अनुसंधान केंद्र पर आकर लगा जैसे की मांगी मुराद पूरी हो गई हो। आइए एक चक्कर लगाते हैं।
10 एकड़ में कृषि विभाग का प्रोजेनी बाग है जिसमे पान का अनुसंधान केंद्र अवस्थित है। पान की खेती का काम लगभग 4 कट्ठा में झोपड़ी नुमा मचान के अंदर किया जाता है। उसका कारण यह है की यह एक अनुसंधान केंद्र है जहां पान से संबंधित विभिन्न विषयों यथा किस ऑर्गेनिक पेस्टीसाइड, Bio compost के इस्तेमाल का असर पान पर कैसा होता है आदि आदि। शेष में ऑफिस, गोदाम, seed production, तुलसी बाग, हर्बल गार्डन, agri waste management , medicinal cafeteria इत्यादि बनाए गए हैं। एक पंचवटी गार्डन भी है जिसमे 5 तरह के पौधे लगाए गए हैं जैसे बेल, आंवला, पीपल, बरगद, अशोक। तुलसी का बाग सबसे बड़ा और मनोहारी था। इतने तरह के तुलसी आज तक नहीं देखे थे। Commercial और non commercial दोनो variety के तुलसी के पौधे लगे थे। कमर्शियल वैरायटी वे हैं जिनमे से तेल भरपूर निकलता है। Centum and Bassalica दो category की तुलसी है जिसमे प्रथम वैरायटी commercial है जिसके अंतर्गत OB,AB,OS, वन तुलसी तथा कपूर तुलसी आती है और ये सभी सुगंधित होती है।Bassalica कैटेगरी अंतर्गत श्याम तुलसी और AB आती है जो मुख्यतः non perfume category है मगर इनके पत्ते बहुत लाभदायक और पूजा के काम में आते हैं। श्याम तुलसी non commercial category का घरेलू तुलसी किस्म का होता है। तुलसी की एक वैरायटी ऐसी थी जो पहले हरा होती है और बाद में बैगनी रंग में बदल जाती है। लगभग 20 तरह के बाग और इतने ही तरह के तुलसी का दर्शन हुआ। राजगीर की पहाड़ी से लाया गया तुलसी का 7 फीट वाला भी बाग था जिसे खूब नापा और देखा गया। Agri-waste management के तहत दो गढ़े बने हुए थे जिनमे से एक को सुदर्शन के पौधों से घेरा हुआ देखा गया। दूसरा गड्ढा को palmarosa पौधों से घेरा गया है। बाहर से किसी बाग का ही रूप दिखता है। मगर उसके अंदर बाग से निकलने वाला कचड़ा फेंका जाता है और बाद में उसे मिट्टी से ढककर कंपोस्ट बनाया जाता है जो यहां के बागीचे में काम में लाया जाता है। लगभग 27 तरह के medicinal plants लगाए गए हैं जो cafeteria बाग में हैं। सुंदर चकोर इस कैफेटेरिया बाग के चारों ओर औषधीय खेती की गई है तथा उसके नाम, इसकी खूबी और उस पौधे के जिस भाग का उपयोग आयुर्वेद में किया जाता है उसकी पट्टिका लगी हुई है। Stebia के पत्ते खिलाया गया जो चीनी से 250 गुना अधिक मीठा होने पर भी हानिकारक नहीं होती बल्कि इसका इस्तेमाल शुगर फ्री बनाने में तथा डायबिटीज ठीक करने में होता है। कालमेघ के पत्ते से कड़वा दुनिया का कोई पत्ता नहीं माना जाता और यह बुखार उतारने में paracetamol से अधिक कारगर बताया गया। इसके अतिरिक्त घृतकुमारी, सुदर्शन, वनप्याज, पाल्मरोज, मूसली, कयो कंद आदि हैं जो मुझे अब तक याद है। हरजोर भी एक औषधीय पौधा है जिससे हड्डियों को जोड़ने के काम में लाया जाता है। मेंथा और पुदीना के भी पौधे लगाए गए हैं। गुग्गल के पौधे और उसमे की गई air layering बहुत ही अच्छी लगी। साधारण और काली हल्दी दोनो पौधे लगाए गए थे। वच, खस और लेमनग्रास के भी पौधे अच्छी मात्रा में लगाए गए हैं। लेमनग्रास की चाय पीने को मिली जो काफी सेहतमंद होती है। सब देखकर नजर फिर से पान पर ही रुक जाती है। यहां पान के औषधीय रूप का दर्शन हुआ। पान में 14 गुण बताए गए। पान खाने पर पहले कड़वा और फिर मीठा लगता है। इसकी कड़वाहट को मीठापन में बदलने के लिए पान के एक पत्ते के साथ एक पत्ता stevia और एक पत्ता मेंथा को डालकर अवधेश जी ने खाने को दिया। सचमुच इसका स्वाद अभूतपूर्व था। अभी तक जो लोग ये समझते थे की पान सिर्फ चुना और कसैली के साथ खाया जाता है वो जान लें की इसके खाने की और भी सारी विधियां हैं। उसमे थूकने की भी जरूरत नहीं होती है बस निगलना ही होता है और उससे स्वसन की बीमारी भी ठीक होती है। चिरकाल से पान के किसान अपने उत्पाद को बनारस ले जाते रहे हैं जहां इसकी अच्छी बाजार है बेचने के लिए। बनारस में इनके पत्तों से chlorophyl निकाल कर उसे उजला कर दिया जाता है। इसे degreening process कहते हैं। इससे इसकी shelf life और कीमत दोनो बढ़ जाती है। De greening करने के लिए एक प्रोसेसिंग इकाई पान सेंटर पर भी देखने को मिली। बनारस में पान खाकर कभी इस्लामपुर नालंदा को याद कर सकते हैं। इस्लामपुर का यह उत्पाद ही बनारस में बनारसी पान का रूप ले लेता है। खईके पान बनारस्वाला में सुगंध नालंदा की धरती की होती है जो बनारस की भट्टी में तैयार होती है। मगध के चार जिलों में इसकी खेती होती है - इस्लामपुर (नालंदा), नवादा, गया और औरंगाबाद। इसीलिए इसे मगही पान कहते हैं। बिहार में यह अधिकतर हरे रंग में पाया जाता है। इसके पत्ते छोटे और बड़े दोनो होते हैं। पान बिहारी सभ्यता संस्कृति की पहचान रही है। पान की खेती और खाने के लिए मधुबनी भी अग्रणी जिलों में से एक है। मगर पूरे बिहार में एक मात्र पान अनुसंधान केंद्र इस्लामपुर में ही है। मगही पान को GI टैग से नवाजा गया है जो इसे अलग पहचान देती है। पान के इस केंद्र पर oil extraction plant बैठ जाने के बाद इसकी कीमत और बढ़ जाएगी। फिर इसकी खेती को और अधिक बढ़ावा मिल सकेगा। मगही पान वो पान है जिसे मोड़ने के बावजूद इसपर सिलवटें नहीं पड़ती। कुछ तो खास है। अवधेश जी माली पान को corona की जंग में सबसे बड़ा हथियार मानते हैं जो corona काल में प्रतिबंधित रही। हो सकता है इसके साथ जर्दा आदि नशा के जुड़ने और इधर उधर थूकने से बीमारी के फैलने का डर हो। अवधेश जी का कहना है की पान को नशा मुक्त करना आवश्यक है। इसे जर्दा आदि के साथ न खाकर stevia और मेंथा के साथ निगलना चाहिए जिससे शरीर में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। इसपर ज्यादा प्रकाश कोई आयुर्वेद के डॉक्टर ही दे सकते हैं। हां इतना अवश्य है की जर्दा आदि नशा से जुड़ने और इधर उधर दीवाल पर थूकने के कारण पान बदनाम हो गया है। 80 के दशक में डॉन सिनेमा के आने के बाद इसका संबंध आवारागर्दी से भी जुड़ गया। मगर आज दिमाग की झिल्ली पर पड़ी पान के संबध में गलतफहमी दूर हो गई। वहां के लोगों ने बताया की पान ही ऐसा पौधा है जिसे जूठे हाथ से अगर छू दिया गया तो पान का पौधा सुख जाता है। आज भी पान की खेत में प्रवेश से पहले माली पूजा करते हैं। पान के औषधीय एवं ईश्वरीय रूप का समग्र दर्शन प्राप्त कर धन्य धन्य हो गया। साथ में वैज्ञानिक श्री अजीत पांडे की भी बाते औषधीय गुणों से भरपूर थी। सारी थकान यात्रा की फुर्र हो गई। यहां से दो चार किलोमीटर की दूरी पर बौरीसराय गांव में 650 चौरसिया परिवार पान की खेती करते हैं जो इस्लामपुर के पास का गांव है। यहां के किसान की जीविका का प्रमुख साधन पान की खेती है। इनका काम है प्रतिवर्ष अपने पत्तों को लेकर बनारस जाना और वहां से मिले cash से जीवनयापन करना। पान के औषधीय गुणों को देखते हुए और पान खाने की गिरती संख्या देखते हुए एक oil extraction plant लगाने की स्वीकृति सरकार स्टार पर दी गई है। कृषि विभाग का उद्यान निदेशालय से 13.55 लाख इसी अनुसंधान को मिला है जिसके तहत 10 लाख का oil extraction plant और 3.55 लाख का shed net बनाना है। शील बायोटेक कंपनी को शेडनेट का काम मिला है। Shed net का काम 500 sqmtr में लगभग पूरा है। oil extraction plant का काम बाराबंकी के स्वराज हर्बल कंपनी को मिला है। वर्क ऑर्डर मिल गया है। मगर काम अभी शुरू नहीं हुआ है। कहा गया है की कंपनी के द्वारा अग्रिम राशि की मांग की जा रही है ताकि कार्य प्रारंभ किया जा सके। इसपर केंद्र के अधिकारी आवश्यक निर्णय जल्द लेंगे। हां पान का तेल बनाए जाने के बाद किसानों का काफी उत्साह वर्धन होगा और पान की असली कीमत उन्हें प्राप्त हो पाएगी क्योंकि पान का तेल बहुत महंगा होता है। इसकी कीमत का अंदाज लगाने के लिए गूगल सर्च किया गया। 4379 रुपैया में 10 ml का price tag देखकर समझ में आ गया। उम्मीद करता हूं की कृषि विभाग का यह पहल पान और पान उत्पादक किसानों के विकास का एक नया रास्ता खोल देगा जो इसकी बनारस जाने की परतंत्रता और आर्थिक स्वंत्रता देने में मील का पत्थर साबित होगी। जय हिंद जय बिहार
Comments
Post a Comment